वो कभी शहर से गुजरे तो जरा पूछेंगे, जख्म हो जाते हैं किस तरह.....दवा पूछेंगे..!! दूरियाँ तो पहले भी मीलों की थीं, महसूस मुझे अब होने लगी हैं...! दुःख हुआ के शक किया तुम पर ,, दुःख रहेगा कि शक सही निकला!!
इन लबों की बेजुबानी तुम नहीं समझे, क्यूं था आंख मे पानी तुम नहीं समझे, यूं तो समझ लेते हो हर गैर जरुरी बात, कभी ज़ज्बात के मानी तुम नहीं समझे, हम तसव्वुर में भी रख दे जां हथेली पर, साथ रहकर भी कहानी तुम नहीं समझे, गिले शिकवे कब के छोड़ दिए हैं हमने, क्यों मुस्कुराने की ठानी तुम नहीं समझे, जर्रे-जर्रे में प्रेम फैल गया खुश्बू बन कर, कब पुष्प ने दी कुर्बानी तुम नहीं समझे।